नई दिल्ली। देश की सुरक्षा में तैनात जवानों का मनोबल बढ़ाने वाले एक नन्हे सिपाही की कहानी आज पूरे देश के लिए प्रेरणा बन गई है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना की निस्वार्थ सेवा करने वाले श्रवण सिंह को आज प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य समारोह में प्रदान किया गया, जिसमें देश के कई वरिष्ठ अधिकारी और विशिष्ट अतिथि मौजूद रहे।
श्रवण सिंह भले ही उम्र में छोटे हों, लेकिन उनका साहस, देशभक्ति और सेवा का जज़्बा किसी अनुभवी योद्धा से कम नहीं है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब सीमा पर हालात बेहद संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण थे, उस समय श्रवण सिंह ने अपने स्तर पर जो योगदान दिया, उसने सेना के जवानों के दिल जीत लिए।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान श्रवण सिंह रोज़ अपने घर से लस्सी, दूध और रोटी लेकर सीमा पर तैनात सैनिकों तक पहुंचता था। कठिन परिस्थितियों, मौसम की मार और जोखिमों के बावजूद वह बिना डरे जवानों के पास जाता और उन्हें भोजन उपलब्ध कराता।
यह सिर्फ खाने की मदद नहीं थी, बल्कि उस बच्चे का स्नेह, अपनापन और सम्मान था, जिसने जवानों को घर से दूर भी अपनेपन का एहसास कराया।
सैनिकों का कहना है कि श्रवण सिंह की यह पहल उनके लिए भावनात्मक सहारा भी थी। सीमा पर ड्यूटी के दौरान जब थकान और तनाव हावी होता, तब इस नन्हे सिपाही की मुस्कान और सेवा भावना उन्हें नई ऊर्जा देती थी।
प्रधानमंत्री ने श्रवण सिंह को सम्मानित करते हुए कहा कि वह आने वाली पीढ़ी के लिए एक आदर्श हैं। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि “श्रवण जैसे बच्चे यह साबित करते हैं कि देश सेवा के लिए उम्र नहीं, भावना और समर्पण सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।”
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि ऐसे बच्चे भारत के उज्ज्वल भविष्य की नींव हैं।
श्रवण सिंह को मिले इस सम्मान से उनके परिवार और गांव में खुशी की लहर दौड़ गई है। परिजनों ने बताया कि श्रवण शुरू से ही सेना के जवानों के प्रति सम्मान रखता था और उनकी सेवा करना उसका सपना था। आज उसका यही सपना देश के सामने एक मिसाल बन गया है।
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार मिलने के बाद श्रवण सिंह की कहानी देशभर में चर्चा का विषय बन गई है। यह कहानी बताती है कि देश की सेवा केवल हथियार उठाने से नहीं होती, बल्कि निस्वार्थ भाव से की गई छोटी-सी मदद भी बड़ा योगदान बन सकती है।
श्रवण सिंह आज सिर्फ एक बच्चे का नाम नहीं, बल्कि देशभक्ति, मानवता और सेवा का प्रतीक बन चुका है। उसकी यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा देती रहेगी।