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DIPSI की अपडेटेड गाइडलाइंस को स्वास्थ्य मंत्रालय की मंजूरी, समय पर स्क्रीनिंग से मां और बच्चे दोनों को खतरे से बचाया जा सकेगा

Gestational Diabetes In Pregnancy: गर्भावस्था में डायबिटीज बन रही बड़ी चुनौती, अब हर महिला की जांच अनिवार्य

गर्भावस्था का समय महिलाओं के जीवन का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इस दौरान जरा-सी लापरवाही मां और होने वाले बच्चे दोनों की सेहत पर भारी पड़ सकती है। हाल के वर्षों में गर्भावस्था के दौरान सामने आने वाली जेस्टेशनल डायबिटीज (Gestational Diabetes Mellitus – GDM) एक गंभीर और तेजी से बढ़ती समस्या बनकर उभरी है। भारत में इसके बढ़ते मामलों को देखते हुए डायबिटीज इन प्रेग्नेंसी स्टडी ग्रुप ऑफ इंडिया (DIPSI) ने अपनी गाइडलाइंस को अपडेट किया है, जिन्हें अब स्वास्थ्य मंत्रालय से भी मंजूरी मिल चुकी है। नई गाइडलाइंस के तहत सभी गर्भवती महिलाओं की डायबिटीज जांच को अनिवार्य माना गया है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, जेस्टेशनल डायबिटीज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके लक्षण अक्सर साफ दिखाई नहीं देते। कई महिलाओं को थकान, बार-बार प्यास लगना या पेशाब आने जैसे सामान्य लक्षणों को गर्भावस्था का हिस्सा समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसे में जब तक जांच होती है, तब तक ब्लड शुगर खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका होता है। इसी वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी गर्भावस्था के 24 से 28 सप्ताह के बीच डायबिटीज की जांच कराने की सलाह देता है। हालांकि, DIPSI का कहना है कि इससे भी बेहतर है कि पहली एंटीनैटल विजिट के दौरान ही स्क्रीनिंग शुरू कर दी जाए।

किसे करानी चाहिए जांच?
नई गाइडलाइंस के अनुसार, जेस्टेशनल डायबिटीज की जांच सिर्फ उन्हीं महिलाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए, जिनमें मोटापा, पारिवारिक इतिहास या पहले से डायबिटीज का खतरा हो। कई मामलों में बिना किसी पारंपरिक जोखिम के भी यह बीमारी हो जाती है। इसलिए सभी गर्भवती महिलाओं की जांच करना सबसे सुरक्षित और प्रभावी तरीका माना गया है। DIPSI की 2023 की सिफारिशों में 75 ग्राम ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (OGTT) को प्राथमिक जांच के रूप में अपनाने पर जोर दिया गया है। यह टेस्ट बिना फास्टिंग के किया जा सकता है, सस्ता है और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी आसानी से उपलब्ध है।

मां और बच्चे पर पड़ता है गंभीर असर
अगर गर्भावस्था के दौरान ब्लड शुगर कंट्रोल में न रहे, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। ज्यादा शुगर होने पर बच्चे का वजन सामान्य से अधिक बढ़ सकता है, जिसे मेडिकल भाषा में मैक्रोसोमिया कहा जाता है। इससे डिलीवरी के समय कंधा फंसने, ऑपरेशन की जरूरत और प्रसव संबंधी जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। जन्म के बाद नवजात को लो ब्लड शुगर, सांस लेने में दिक्कत या NICU में भर्ती होने की जरूरत पड़ सकती है। कुछ गंभीर मामलों में मृत शिशु जन्म का जोखिम भी बढ़ जाता है।

इलाज और बचाव के उपाय
डॉक्टरों का कहना है कि समय रहते जेस्टेशनल डायबिटीज का पता चल जाए, तो इसे काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। संतुलित और पोषणयुक्त डाइट, नियमित ब्लड शुगर मॉनिटरिंग और हल्की-फुल्की एक्सरसाइज जैसे रोजाना टहलना बेहद फायदेमंद होता है। इससे शरीर में इंसुलिन बेहतर तरीके से काम करता है। अगर लाइफस्टाइल में बदलाव से शुगर कंट्रोल न हो, तो डॉक्टर की निगरानी में इंसुलिन या अन्य सुरक्षित दवाएं दी जाती हैं।

डिलीवरी के बाद भी खतरा बरकरार
विशेषज्ञों के अनुसार, जेस्टेशनल डायबिटीज डिलीवरी के बाद खत्म जरूर हो सकती है, लेकिन इसका असर लंबे समय तक रह सकता है। जिन महिलाओं को गर्भावस्था में यह समस्या होती है, उनमें आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज या प्रीडायबिटीज का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। रिसर्च बताती है कि यदि सावधानी न बरती जाए, तो अगले 10 वर्षों में लगभग 50 प्रतिशत महिलाओं को डायबिटीज हो सकती है। इसलिए डिलीवरी के बाद भी नियमित जांच और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना बेहद जरूरी है।

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