नई दिल्ली। देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली पहाड़ियों को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने अरावली से जुड़े अपने पूर्व आदेश पर फिलहाल स्थगन (स्टे) लगा दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने खनन गतिविधियों को लेकर केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों से विस्तृत जानकारी और जवाब भी तलब किया है।
मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को तय की गई है। कोर्ट के इस फैसले को पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अरावली पर्वत श्रृंखला हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के लिए ग्रीन बैरियर का काम करती है। यह क्षेत्र न केवल भूजल संरक्षण, बल्कि वायु प्रदूषण रोकने और मरुस्थलीकरण से बचाव में भी अहम भूमिका निभाता है।
बीते वर्षों में अरावली क्षेत्र में खनन, रियल एस्टेट और औद्योगिक गतिविधियों को लेकर कई बार विवाद खड़ा हुआ है। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने पहले सख्त आदेश जारी किए थे, जिनका उद्देश्य पर्यावरणीय क्षति को रोकना था।
सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष यह तर्क रखा गया कि पूर्व आदेशों के व्यापक प्रभाव को लेकर कई व्यावहारिक और कानूनी सवाल अभी स्पष्ट नहीं हैं।
इसी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक सभी पक्षों से तथ्यात्मक स्थिति और खनन से जुड़ा पूरा ब्योरा सामने नहीं आ जाता, तब तक पुराने आदेश को अस्थायी रूप से स्थगित रखा जाए।
कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से पूछा है कि—
अरावली क्षेत्र में इस समय कहां-कहां और किस स्तर पर खनन हो रहा है?
पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया का पालन कितना हो रहा है?
खनन से पर्यावरण और स्थानीय आबादी पर क्या असर पड़ा है?
इन सभी बिंदुओं पर सरकारों को विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
पर्यावरणविदों का मानना है कि कोर्ट का यह फैसला तथ्यों के आधार पर अंतिम निर्णय लेने की दिशा में एक जरूरी कदम है। उनका कहना है कि बिना पूरी जानकारी के सख्त आदेश लागू करने से कई बार कानूनी और प्रशासनिक जटिलताएं बढ़ जाती हैं।
अब सभी की नजरें 21 जनवरी 2026 की सुनवाई पर टिकी हैं, जब सुप्रीम कोर्ट सरकारों की रिपोर्ट और दलीलों के आधार पर आगे की दिशा तय करेगा। यह फैसला तय करेगा कि अरावली क्षेत्र में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध, नियंत्रित अनुमति या कोई नया नियामक ढांचा लागू होगा।