बांग्लादेश में एक बार फिर अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर हिंसा के गंभीर आरोप सामने आए हैं। हाल के दिनों में हुई घटनाओं ने वहां रह रहे हिंदुओं के बीच भय और असुरक्षा का माहौल पैदा कर दिया है। खास तौर पर दीपू चंद्र दास और अमृत मंडल की कथित हत्या के बाद हालात और भी तनावपूर्ण हो गए हैं। इन घटनाओं के बाद बांग्लादेश के कई हिस्सों में हिंदू परिवार खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं और भारत से खुली सीमा की गुहार लगा रहे हैं।
स्थानीय सूत्रों और सामाजिक संगठनों के अनुसार, कई जिलों में हिंदू बस्तियों पर हमले, मंदिरों में तोड़फोड़, जबरन घर छोड़ने की धमकियां और सामाजिक बहिष्कार की घटनाएं सामने आई हैं। पीड़ितों का कहना है कि वे लंबे समय से दबाव और डर के साये में जी रहे थे, लेकिन हालिया हत्याओं ने उनके सब्र का बांध तोड़ दिया है। अब हालात ऐसे हो गए हैं कि लोग अपनी जान बचाने के लिए देश छोड़ने को मजबूर महसूस कर रहे हैं।
दीपू चंद्र दास और अमृत मंडल की मौत ने पूरे हिंदू समुदाय को झकझोर कर रख दिया है। परिजनों का आरोप है कि दोनों को निशाना बनाकर हत्या की गई और स्थानीय स्तर पर उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिल पाई। इन घटनाओं के बाद कई परिवारों ने अपने घरों में ताले डाल दिए हैं, जबकि कुछ लोग अस्थायी रूप से रिश्तेदारों या सुरक्षित स्थानों पर शरण लेने को मजबूर हैं।
बांग्लादेश में फंसे हिंदू नागरिकों का कहना है कि वे भारत को अपना प्राकृतिक और सांस्कृतिक सहारा मानते हैं। इसी वजह से सोशल मीडिया और विभिन्न माध्यमों के जरिए भारत सरकार से भावुक अपील की जा रही है—“बॉर्डर खोल दो, हमें बचा लो।” उनका कहना है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो वहां रहना उनके लिए जानलेवा साबित हो सकता है।
मानवाधिकार संगठनों ने भी बांग्लादेश सरकार से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। संगठनों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में धर्म या समुदाय के आधार पर हिंसा स्वीकार्य नहीं हो सकती। वहीं, अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी इस मामले में हस्तक्षेप कर दबाव बनाने की अपील की जा रही है ताकि पीड़ितों को सुरक्षा और न्याय मिल सके।
भारत में भी इस मुद्दे को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह बांग्लादेश सरकार से कूटनीतिक स्तर पर बात करे और वहां रह रहे हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर ठोस कदम उठाए। कुछ संगठनों ने मानवीय आधार पर अस्थायी राहत या शरण की व्यवस्था पर विचार करने की मांग भी की है।
फिलहाल, बांग्लादेश में फंसे हिंदू समुदाय की नजरें भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर टिकी हुई हैं। उनका कहना है कि वे शांति और सम्मान के साथ जीना चाहते हैं, लेकिन मौजूदा हालात में उन्हें अपनी जान बचाने के लिए मदद की सख्त जरूरत है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट और गहराने की आशंका जताई जा रही है।